जमशेदपुर में पर्वत एवं नदी संरक्षण पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ, सरयू राय बोले– “पर्वत भारत की पहली आधारभूत संरचना”

जमशेदपुर में पर्वत एवं नदी संरक्षण पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ, सरयू राय बोले– “पर्वत भारत की पहली आधारभूत संरचना”
जमशेदपुर के मोतिलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के सभागार में शुक्रवार को पर्वत एवं नदी संरक्षण विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। इस राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय की पहल पर किया गया। सम्मेलन में देशभर से पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता, जल विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलित कर किया गया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा उपस्थित रहे, जबकि देश के प्रसिद्ध जल संरक्षण विशेषज्ञ एवं “जलपुरुष” के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह सम्मेलन के मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने पर्वतों, नदियों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपने विचार रखे तथा वर्तमान समय में प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और जीवन का आधार पर्वत और नदियां हैं। यदि पर्वत सुरक्षित नहीं रहेंगे तो नदियां भी समाप्त हो जाएंगी और आने वाली पीढ़ियों के सामने जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।

सम्मेलन में पर्वतों से जुड़े गंभीर सवालों पर विस्तृत चर्चा की गई। इस दौरान “पर्वत संरक्षण प्रारूप” को अंतिम रूप देने की दिशा में भी विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन में यह बात प्रमुखता से रखी गई कि पर्वत केवल भूगोल का हिस्सा नहीं बल्कि भारत की जल-निरंतरता, पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता, कृषि व्यवस्था और आपदा-प्रतिरोधक क्षमता की मूल आधारशिला हैं।
कार्यक्रम में प्रस्तावित संवैधानिक ढांचे “भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026” पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि भारत में जंगल, खनन, वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कानून मौजूद हैं, लेकिन अब तक पर्वतों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई ठोस संवैधानिक व्यवस्था नहीं बनाई गई है। सम्मेलन के माध्यम से इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श शुरू करने की आवश्यकता बताई गई।

वक्ताओं ने कहा कि पर्वत केवल प्राकृतिक संरचनाएं नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों, आध्यात्मिक परंपराओं और जल-ज्ञान के संरक्षक भी हैं। पर्वत कमजोर होने पर बाढ़, भूस्खलन, भूजल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं, जिसका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
सम्मेलन में यह भी कहा गया कि भारत अपने पर्वतों को नष्ट होने योग्य नहीं मान सकता। पर्वतों की सुरक्षा को राष्ट्रीय हित और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा से जोड़ते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। दो दिवसीय इस सम्मेलन में कई विशेषज्ञ पर्यावरण संरक्षण और नदी-पर्वत बचाने के उपायों पर अपने विचार रखेंगे।

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