रांची के नगड़ी में बिना अधिग्रहण के आदिवासियों/ मूलवासियों की जमीन को रिम्स-2 के नाम पर छीनने का प्रयास कर रही यह आदिवासी विरोधी सरकार अब सारी सीमाएं लांघ रही है।
यह रांची शहर आदिवासियों एवं मूलवासियों की जमीन पर बसा हुआ है। एचईसी ने 7,200 एकड़ जमीन ली, लेकिन प्लांट मात्र 500 एकड़ में बनाया। लॉ यूनिवर्सिटी के लिए 120 एकड़ जमीन ली गई। ऐसे कई अधिग्रहण हुये। आज तक किसी भी मामले में किसी को पुनर्वास नहीं मिला। जब HEC ने जमीनें वापस की, तो सरकार उसे रैयतों को वापस करने की जगह, उसे बेचने लगी। आपने हाई कोर्ट बनाया, विधानसभा बनाया, माननीयों के लिए बंगले भी बने, लेकिन उन रैयतों को क्या मिला, जिनकी जमीनों पर यह सब बन रहा था?
रांची के शहरी क्षेत्र के तीनों विधानसभाओं (रांची, हटिया एवं कांके) में जो थोड़ी बहुत जमीन आदिवासियों/ मूलवासियों की बची है, उसे भी यह सरकार छीनने का षडयंत्र रच रही है। आपका मुख्य मकसद इस क्षेत्र से आदिवासियों/ मूलवासियों को उजाड़ना ही है क्या?
सन 1957-58 में हुए जिस अधिग्रहण की बात सरकार कर रही है, वह कभी पूरा ही नहीं हुआ। उस समय हुए विरोध के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने इस प्रक्रिया को रोकने की बात कही थी। उसके बाद यह प्रक्रिया रुकी और स्थानीय किसान 2012-13 तक उस भूमि की मालगुजारी भी देते रहे। फिर इस अधिग्रहण को पूरा मानना गलत होगा।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 यह स्पष्ट करता है कि यदि रैयतों को मुआवजा नहीं मिला हो, अथवा उस भूमि पर सरकार का कब्जा ना हो तो अधिग्रहण की वह प्रक्रिया रद्द समझी जाती है। यहाँ न मुआवजा मिला, ना ही सरकार कब्जा कर पाई (वहां खेती हो रही थी), तो सिर्फ सरकार के कहने से अधिग्रहण मान लिया जाए क्या?
रांची में कई जगह बंजर जमीन उपलब्ध है। यह सरकार HEC से सैकड़ों एकड़ जमीन ले चुकी है, दोबारा पाँच सौ एकड़ से अधिक भूमि लेने की तैयारी में भी है, फिर वहाँ इस अस्पताल का निर्माण क्यों नहीं करवाने में क्या दिक्कत है?
राज्य में हर दूसरे दिन खाट पर मरीजों को अस्पताल ले जाते हुए तस्वीरें वायरल होती हैं। मरीजों को एम्बुलेंस मिलना लगभग असंभव है। चाईबासा में सरकारी अस्पताल में बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ा कर, उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है। एक मजबूर पिता द्वारा अपने बच्चे का झोले में शव ले जाती तस्वीरें इनको शर्मसार नहीं करतीं? रांची में रिम्स की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। लेकिन फिर भी इन्हें उस व्यवस्था को ठीक नहीं करना है, एक नया अस्पताल बनाना है। क्यों?
पिछले साल जमशेदपुर में MGM अस्पताल की नई बिल्डिंग बनी, लेकिन वहां क्या बदला? आज भी वहां ना तो दवाइयां हैं, ना टेस्ट की सुविधा, ना डॉक्टर मिलते हैं, ना स्टाफ? तो फिर क्या वहाँ बिल्डिंग इलाज करेगी? सरायकेला में मैंने एक बड़ा अस्पताल बनवाया था, डेढ़ साल से भवन बन कर तैयार है, लेकिन सरकार उसे शुरू नहीं करना चाहती? क्यों?
क्या भूमिपुत्रों की जमीनें लूटने के लिए झारखंड राज्य का निर्माण किया गया था? इस बदहाल व्यवस्था में किसानों को परेशान कर के, अथवा उन्हें भूमिहीन कर के सरकार को क्या मिलेगा?
रांची का यह क्षेत्र शेड्यूल 5 एरिया में आता है, यहां सीएनटी एक्ट समेत तमाम कानून आदिवासियों/ मूलवासियों के संरक्षण के लिए बने हैं। उन कानूनों को बनाते समय ब्रिटिश लोगों ने हमारे अधिकारों को सम्मान दिया था, लेकिन, आज यह सरकार मानों हम लोगों को उजाड़ना ही अपना एकमात्र मकसद बना चुकी है। इस क्षेत्र में आदिवासियों के गाँव अब खोजने से भी नहीं मिलते। क्या इसीलिए झारखंड अलग राज्य बनाया गया था?
यह सरकार जिस भाषा को समझती है, इसे उसी भाषा में समझाया जायेगा। इस तानाशाही सरकार के खिलाफ राज्य भर के आदिवासी मूलवासी नगड़ी में महादरबार लगाएंगे, और लाखों लोग मिल कर इस जमीन को बचाएंगे, इन खेतों में हल चलाएंगे।
जागो आदिवासी !
जागो झारखंडी !!





