पलामू में फिर भड़का भाषा विवाद, डिजिटल प्लेटफॉर्म से शुरू हुआ आंदोलन

पलामू में फिर भड़का भाषा विवाद, डिजिटल प्लेटफॉर्म से शुरू हुआ आंदोलन

पलामू झारखंड के पलामू, गढ़वा और लातेहार क्षेत्र में स्थानीय भाषा को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। राज्य सरकार द्वारा जारी स्थानीय भाषाओं की सूची के बाद क्षेत्र में विरोध और आंदोलन का माहौल बन गया है।

युवाओं और छात्र संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए आंदोलन की शुरुआत कर दी है।
सरकार ने पलामू और गढ़वा के लिए नागपुरी एवं कुडुख (उरांव) को स्थानीय भाषा के रूप में अधिसूचित किया है। इस फैसले का विरोध करते हुए क्षेत्र के लोग भोजपुरी, मगही, अंगिका और पलमुआ भाषा को भी सूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। इसी को लेकर “पलमुआ भाषा संघर्ष समिति” का गठन किया गया है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को जोड़ रही है।

भाषा विवाद नया नहीं है। वर्ष 2016 में नियोजन नीति लागू होने के बाद अधिसूचित और गैर-अधिसूचित क्षेत्रों के विभाजन से यह मुद्दा सामने आया था। इसके बाद 2021 में जारी नई भाषा सूची ने विवाद को और बढ़ा दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन भाषाओं को मान्यता दी गई है, वे इस क्षेत्र में न तो पढ़ाई जाती हैं और न ही आम तौर पर बोली जाती हैं।

पलामू और गढ़वा क्षेत्र में भोजपुरी, मगही और पलमुआ भाषा का व्यापक प्रभाव है। 2021 के नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर में भी पलमुआ भाषा को स्थान मिला है। जानकारों के अनुसार, यह भाषा हिंदी, भोजपुरी, मगही और नागपुरी का मिश्रण है और लाखों लोग इसे बोलते हैं।

आंदोलन से जुड़े नेताओं और युवाओं का आरोप है कि सरकार स्थानीय भाषा के मुद्दे पर क्षेत्र के साथ अन्याय कर रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में फैल सकता है।

यह मुद्दा विधानसभा में भी कई बार उठ चुका है। विभिन्न दलों के नेताओं ने सरकार से मांग की है कि स्थानीय भाषाओं की सूची में क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल कर छात्रों और युवाओं के साथ न्याय किया जाए। फिलहाल, डिजिटल माध्यम से शुरू हुआ यह आंदोलन आने वाले समय में बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

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