आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार के अंतिम दिन आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “ प्रगति और पंचवेदनाएँ ” शीर्षक विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रगति वह है जहाँ गति है और वह गति शुभ की ओर हो।

आध्यात्मिक प्रगति का उद्देश्य है स्थूल स्पंदनों को सूक्ष्म स्पंदनों में रूपांतरित करना

आध्यात्मिक क्षेत्र में जो प्रगति है वह वास्तविक एवं सच्ची प्रगति है

 

वास्तविक प्रगति में जीवभाव से शिवभाव की ओर होती है

जमशेदपुर:
आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार के अंतिम दिन आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “ प्रगति और पंचवेदनाएँ ” शीर्षक विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रगति वह है जहाँ गति है और वह गति शुभ की ओर हो। इसी प्रकार अधोगति वह है जहाँ गति शुभ के साथ युक्त नहीं है।
प्रगति चार क्षेत्रों में होती है –
1.भौतिक क्षेत्र में
2.बौद्धिक क्षेत्र में
3.मानसाध्यात्मिक क्षेत्र में
4.विशुद्ध आध्यात्मिक क्षेत्र में
ये चारों क्षेत्र क्रमशः काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष से संबंधित हैं।
भौतिक क्षेत्र में प्रगति से आशय शारीरिक सुख-सुविधाओं से है, लेकिन इस क्षेत्र में दो प्रकार की अभिव्यक्ति देखी जाती है – एक अनुकूल वेदनीयम् तथा दूसरी प्रतिकूल वेदनीयम्। पेंडुलम की गति में एक छोर सुख है तो दूसरा छोर दुख है। एक Positive (अनुकूल) है तो दूसरा Negative (प्रतिकूल) है। अतः भौतिक क्षेत्र में परिणाम शून्य है, अर्थात न तो वृद्धि होती है और न ही वास्तविक प्रगति।
उदाहरणस्वरूप – विज्ञान की प्रगति ने सुख-साधन तो बढ़ा दिए, लेकिन उसके प्रतिकूल प्रभाव या परिणाम भी हुए – बीमारियाँ, प्रदूषण, दवाओं के side effect, रेडिएशन, इत्यादि।
मानसिक या बौद्धिक क्षेत्र में चार अनुभूतियों की अभिव्यक्ति अनुभव की जाती है –
अनुकूल वेदनीयम्, प्रतिकूल वेदनीयम्, अवेदनीयम् एवं निरपेक्ष वेदनीयम्।
मानसिक या बौद्धिक स्तर में प्रगति तो होती है, किन्तु साथ-साथ नकारात्मक प्रभाव भी देखे जाते हैं जैसे – तनाव, अवसाद, चिन्ता, कुंठा, हीनभावना, मानसिक रोग इत्यादि। अतः मानसिक स्तर में भी पेंडुलम के दो छोरों की भाँति एक तरफ अनुकूल (सुख) तो दूसरी तरफ प्रतिकूल (दुख) रहता है। अतः Positive तथा Negative दोनों का प्रभाव शून्य रह जाता है। अतः मानसिक स्तर में भी वास्तविक प्रगति नहीं है।
मानसाध्यात्मिक एवं विशुद्ध आध्यात्मिक क्षेत्र में जो प्रगति है वह वास्तविक एवं सच्ची प्रगति है क्योंकि यहाँ जो भी गति है वह केवल शुभ की ओर तथा केवल धनात्मक गति है, ऋणात्मक गति यहाँ नहीं है। क्योंकि यहाँ प्रगति परिधि से केन्द्र की ओर (जीवभाव से शिवभाव की ओर) होती है।
इस गति का परिणाम है – शारीरिक, भौतिक, मानसिक, मानसाध्यात्मिक एवं विशुद्ध आध्यात्मिक संतुलन, आनन्द प्राप्ति, पूर्ण स्वतंत्रता, ईश्वर की ओर अग्रगति, मन की एकाग्रता, विषयगत सामंजस्य के साथ विचारगत समन्वय, मन पर पूर्ण नियंत्रण इत्यादि।
इस आध्यात्मिक प्रगति का उद्देश्य है – स्थूल स्पंदनों को सूक्ष्म स्पंदनों में रूपांतरित करना, अति मानसिक स्पंदनों को मानसाध्यात्मिक स्पंदनों में रूपांतरित करना। और ऐसा होने से मनुष्य का सुख-दुःख दोनों भी मन को प्रभावित नहीं कर पाएगा। इस अवस्था को ही गीता में कहा गया है –
“दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।”
सुख की आकांक्षा अधिक मात्रा में कम हो जाएगी और दुःख की अनुभूति भी कम हो जाएगी।

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