सरयू राय से जुड़े आहार पत्रिका मामले में हाईकोर्ट सख्त, कहा- अनिश्चितकाल तक फाइल लटकाकर नहीं रख सकती सरकार

सरयू राय से जुड़े आहार पत्रिका मामले में हाईकोर्ट सख्त, कहा- अनिश्चितकाल तक फाइल लटकाकर नहीं रख सकती सरकार

 

– आहार पत्रिका के प्रकाशन और वितरण में 3.38 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता का मामला, एसीबी को जांच सौंपने पर शीघ्र निर्णय लेने की अपेक्षा जताई

– राज्य सरकार के शपथपत्र में तत्कालीन मंत्री सरयू राय समेत अन्य नामजद आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं के तहत आरोप सही पाए जाने का उल्लेख

– भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कार्रवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति का इंतजार

रांची। झारखंड के पूर्व खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग के मंत्री सरयू राय से जुड़े आहार पत्रिका प्रकाशन और वितरण में 3.38 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी मामले को राज्य सरकार के कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग के पास अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। यदि संबंधित प्राधिकारी ने अब तक कोई निर्णय नहीं लिया है, तो उससे शीघ्र उचित निर्णय लेने की अपेक्षा की जाती है। न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की अदालत ने चार नवंबर 2026 को मनोज सिंह की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका संख्या 663/2025 का निष्पादन करते हुए यह टिप्पणी की।

यह मामला खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग की ओर से अक्टूबर 2017 से मार्च 2019 के बीच प्रकाशित और वितरित की गई मासिक पत्रिका ‘आहार’ से संबंधित है। याचिकाकर्ता मनोज सिंह ने आरोप लगाया है कि पत्रिका के मुद्रण, प्रकाशन और वितरण के नाम पर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया। इस पूरे प्रकरण में 3 करोड़ 38 लाख 26 हजार 473 रुपये का अनुचित लाभ प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि तत्कालीन मंत्री सरयू राय और अन्य संबंधित लोगों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कथित रूप से सरकारी धन की हेराफेरी की। हालांकि, ये आरोप याचिका में लगाए गए हैं और हाईकोर्ट के इस आदेश में आरोपियों के दोषी होने का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

छह सितंबर 2024 को दर्ज हुई थी प्राथमिकी

इस मामले में मनोज सिंह की शिकायत पर छह सितंबर 2024 को रांची के अरगोड़ा थाने में कांड संख्या 228/2024 दर्ज किया गया था। प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता की धारा 403, 406, 408, 409, 420 और 120बी के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 11, 12 और 13(2) का उल्लेख है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन बाद में मामला लंबित हो गया। उन्होंने जांच सीबीआई, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी), निगरानी विभाग अथवा किसी अन्य स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंपने की मांग की थी।

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि राज्य सरकार जांच की वर्तमान स्थिति, संबंधित फाइलों, विभागीय टिप्पणियों और अब तक लिए गए निर्णयों का पूरा विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही जांच में हो रही देरी का कारण स्पष्ट किया जाए।

सरकार के शपथपत्र में सरयू राय समेत पांच पक्षों के खिलाफ आरोप सही पाए जाने का उल्लेख

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी शपथपत्र का हवाला दिया। अदालत के आदेश में उद्धृत शपथपत्र के पैराग्राफ 18 के अनुसार, पुलिस की जांच और पर्यवेक्षण के दौरान नामजद आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 403, 406, 408, 409, 420 और 120बी के अंतर्गत मामला सही पाया गया था।

शपथपत्र में जिन लोगों के नाम का उल्लेख किया गया है, उनमें तत्कालीन खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री सरयू राय, उनके निजी सचिव आनंद कुमार, सुनील शंकर, बाबा कंप्यूटर्स के मालिक रितेश गुप्ता और जेपीपीएल के प्रबंध निदेशक शामिल हैं।

हालांकि, शपथपत्र में यह भी स्पष्ट किया गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आगे की कार्रवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति प्राप्त करना जरूरी है। इसी कारण संबंधित अनुमति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई करना उचित बताया गया। शपथपत्र में मामला जांच के अधीन होने की जानकारी दी गई थी।

चार जून 2025 को पुलिस मुख्यालय ने भेजा था पत्र

हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत पूरक जवाबी शपथपत्र से यह भी सामने आया कि मामले की जांच एसीबी को सौंपने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की गई थी। पुलिस मुख्यालय के पत्रांक 1385/X, दिनांक चार जून 2025 के आधार पर कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग को पत्र भेजा गया था। इसमें अरगोड़ा थाना कांड संख्या 228/2024 की आगे की जांच एसीबी को सौंपने के संबंध में आवश्यक निर्देश मांगे गए थे।

सरकार की ओर से दाखिल पूरक शपथपत्र के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामलों की आगे की जांच एसीबी, झारखंड द्वारा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति मिलने और मामला अपने हाथ में लेने के बाद की जाती है। इस मामले में भी संबंधित विभाग से आवश्यक निर्देश प्राप्त होने का इंतजार किया जा रहा था।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि नवंबर 2025 में दाखिल पूरक शपथपत्र में ही यह स्पष्ट हो गया था कि मामला कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग के पास लंबित है। इसके बावजूद निर्णय नहीं होने के कारण जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। अधिवक्ता ने दलील दी कि किसी मामले को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा- जल्द लिया जाए उचित निर्णय

न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी और पूरक शपथपत्र का अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से भी संबंधित है और आगे की जांच एसीबी, झारखंड द्वारा किए जाने की बात कही गई है। इसके लिए आवश्यक निर्देश प्राप्त करने का प्रस्ताव कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग को भेजा गया था।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग के समक्ष अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकता। यदि संबंधित प्राधिकारी ने अब तक कोई उचित निर्णय नहीं लिया है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह शीघ्र निर्णय लेगा।

इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने आपराधिक रिट याचिका का निष्पादन कर दिया। साथ ही अंतरिम आवेदन संख्या 1488/2026 तथा अन्य लंबित अंतरिम आवेदनों को भी समाप्त कर दिया गया।

सीबीआई ने उठाया तकनीकी सवाल, सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से कोई उपस्थित नहीं

सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अधिवक्ता दीपक कुमार भारती उपस्थित हुए। उन्होंने याचिका में तकनीकी खामी की ओर अदालत का ध्यान दिलाया। सीबीआई के अधिवक्ता ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और जिसकी जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की जा रही है, उसे ही इस रिट याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया है।

वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता आकाश अजीत कुमार, ऋतिक वर्मा और शोवित राज का नाम भी आदेश में दर्ज है। चार नवंबर की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। हालांकि, सरकार के जवाबी और पूरक शपथपत्र पहले से अदालत के रिकॉर्ड पर उपलब्ध थे।

अदालत ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि जिस व्यक्ति के संबंध में याचिका दायर की गई थी, उसे पक्षकार नहीं बनाया गया था। इसके बावजूद सरकारी शपथपत्र में दर्ज तथ्यों और मामले के लंबे समय से लंबित रहने को देखते हुए अदालत ने संबंधित विभाग से शीघ्र निर्णय लेने की अपेक्षा जताई।
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बॉक्स : एक नजर में पूरा मामला

-मामला : खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग की मासिक पत्रिका ‘आहार’ के मुद्रण, प्रकाशन और वितरण में कथित अनियमितता।
– कथित राशि : 3,38,26,473 रुपये।
– संबंधित अवधि : अक्टूबर 2017 से मार्च 2019।
* प्राथमिक : अरगोड़ा थाना कांड संख्या 228/2024, दिनांक छह सितंबर 2024।
* याचिकाकर्ता : मनोज सिंह, रांची।
* आरोपियों का उल्लेख : पूर्व मंत्री सरयू राय, आनंद कुमार, सुनील शंकर, रितेश गुप्ता और जेपीपीएल के प्रबंध निदेशक।
* चार जून 2025 : पुलिस मुख्यालय के पत्र के आधार पर निगरानी विभाग से आवश्यक निर्देश मांगे गये।
* हाईकोर्ट में मामला : डब्ल्यूपी (क्रिमिनल) संख्या 663/2025।
आदेश की तारीख : चार नवंबर 2026।
* अदालत का निर्देशात्मक अवलोकन : मामला अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता; संबंधित विभाग शीघ्र उचित निर्णय ले।
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अब निगरानी विभाग के फैसले पर टिकी नजर

हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस मामले में कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग के निर्णय का महत्व बढ़ गया है। सरकारी शपथपत्र के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित पहलुओं की आगे की जांच एसीबी द्वारा की जानी है और इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक बतायी गयी है। अदालत ने सीधे सीबीआई जांच का आदेश नहीं दिया है और न ही किसी आरोपी की दोषसिद्धि पर कोई निष्कर्ष निकाला है। उसने संबंधित विभाग से लंबित मामले में शीघ्र उचित निर्णय लेने की अपेक्षा जतायी है। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस मामले में क्या निर्णय लेता है और जांच की आगे की प्रक्रिया किस प्रकार बढ़ती है।

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