भारत के जनजातीय समाज के इतिहास में कार्तिक उरांव का नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और अधिकारों के संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। वे कुशल अभियंता, प्रखर चिंतक और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। जनजातीय समाज की समस्याओं को उन्होंने संसद से लेकर सामाजिक मंचों तक उठाया। विशेष रूप से धर्मांतरण और उसके कारण आदिवासी समुदायों की पारंपरिक पहचान पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर वे मुखर रहे।कार्तिक उरांव का मानना था कि आदिवासी समाज की उन्नति उसकी सांस्कृतिक जड़ों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए होनी चाहिए। उनके विचारों ने जनजातीय समाज की पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विमर्श को महत्वपूर्ण दिशा दी।
धर्मांतरण और आरक्षण के प्रश्न पर पहल
कार्तिक उरांव ने जनजातीय समाज में होने वाले धर्मांतरण के प्रश्न को गंभीरता से उठाया। उनका तर्क था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं का लाभ जारी रखने के विषय पर स्पष्ट संवैधानिक और कानूनी चर्चा होनी चाहिए।इसी उद्देश्य से उन्होंने 1967 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संबंधी आदेशों में संशोधन का प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत किया। इस विधेयक पर विचार के लिए गठित संयुक्त समिति ने विस्तृत विचार-विमर्श किया और 17 नवंबर 1969 को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। इन सिफारिशों में धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों की अनुसूचित जनजाति संबंधी स्थिति पर विचार किया गया था।हालांकि, इस विषय पर संसद में अपेक्षित निर्णय नहीं हो सका। कार्तिक उरांव ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाने का प्रयास किया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 10 नवंबर 1970 को उन्होंने बड़ी संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सौंपा। उनका आग्रह था कि जनजातीय समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक स्थिति से जुड़े इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए।नवंबर 1970 में संसद में इस विषय पर बहस हुई, लेकिन विधेयक अपने प्रस्तावित स्वरूप में पारित नहीं हो सका। इस घटनाक्रम ने कार्तिक उरांव को निराश किया, फिर भी उन्होंने जनजातीय समाज के हितों से जुड़े प्रश्नों को उठाना जारी रखा।
‘बीस वर्ष की काली रात’ और उनके विचार
इस विषय पर अपने विचारों और चिंताओं को सामने रखने के लिए कार्तिक उरांव ने ‘बीस वर्ष की काली रात’ नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने धर्मांतरण, जनजातीय समाज की पहचान और अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली संवैधानिक सुविधाओं से जुड़े प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए।उनका मानना था कि जनजातीय समाज की समस्याओं पर चर्चा करते समय उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक जीवन-पद्धति को समझना आवश्यक है। वे धर्मांतरण के सामाजिक प्रभावों को लेकर चिंतित थे और चाहते थे कि जनजातीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक रहें।यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक पहचान और आरक्षण की पात्रता का निर्धारण संबंधित कानूनों, संवैधानिक प्रावधानों तथा समुदाय-विशेष की अधिसूचित स्थिति के आधार पर होता है। इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है, ऐसा सामान्य निष्कर्ष निकालने के बजाय इस विषय को कानूनी संदर्भ में समझना चाहिए।
परंपराओं में देखते थे सांस्कृतिक एकता
कार्तिक उरांव जनजातीय समाज की लोकपरंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं को उसकी पहचान का महत्वपूर्ण आधार मानते थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि भारत के विभिन्न जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं में व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध दिखाई देते हैं।उनसे संबंधित विवरणों में एक ऐसे आयोजन का उल्लेख मिलता है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जनजातीय समुदायों के पाहन, गांव के बुजुर्गों और टाना भगतों जैसे पारंपरिक प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। उनसे जन्म, विवाह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों की जानकारी ली गई। इन गीतों में राम, कृष्ण, सीता और कौशल्या जैसे पात्रों से संबंधित प्रसंगों का उल्लेख होने की बात कही जाती है।कार्तिक उरांव के लिए ऐसे सांस्कृतिक संदर्भ जनजातीय समाज और भारतीय परंपराओं के बीच संबंधों को समझने का माध्यम थे। उनका विचार था कि आदिवासी समुदायों की लोकसंस्कृति का सम्मान होना चाहिए और उनकी परंपराओं को बाहरी दृष्टिकोण से देखने के बजाय उनके अपने ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर समझा जाना चाहिए।
सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का संदेश
कार्तिक उरांव का जीवन इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक पद पर रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने समाज की सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को प्राथमिकता दे सकता है। उन्होंने जनजातीय समाज की शिक्षा, सामाजिक प्रगति और राजनीतिक भागीदारी को महत्वपूर्ण माना। साथ ही, वे चाहते थे कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की परंपराओं और विशिष्ट पहचान की उपेक्षा न हो।उनकी जयंती केवल एक नेता को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के अधिकारों, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक विकास पर विचार करने का भी अवसर है। उनके विचारों से सहमति या असहमति रखने वाले लोग भी इस तथ्य को स्वीकार कर सकते हैं कि उन्होंने जनजातीय पहचान और धर्मांतरण जैसे संवेदनशील विषयों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया।
कार्तिक उरांव की विरासत हमें यह संदेश देती है कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति शिक्षा, समान अवसर, संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत के सम्मान के साथ ही संभव है। जनजातीय समाज की परंपराओं और पहचान का संरक्षण तथा उसके विकास के लिए सार्थक प्रयास ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।





