*70 KM की दौड़, तीन साल, तीन आवेदन फिर भी नहीं मिली पंजी–2 की कॉपी ।।

*अभिलेखागार कार्यालय बना गरीबों के लिए ‘यातना कार्यालय ।।*

 

*70 KM की दौड़, तीन साल, तीन आवेदन फिर भी नहीं मिली पंजी–2 की कॉपी ।*

 

*चतरा(संजीत मिश्रा)*। जिस जिला अभिलेखागार कार्यालय का उद्देश्य आम नागरिकों को उनके दस्तावेजों का अधिकार दिलाना है । वही कार्यालय आज गरीब ,लाचार-बेबस ग्रामीण लोगों के लिए सबसे बड़ा उत्पीड़न केंद्र बन गया है। टंडवा प्रखंड के बड़गांव रविंद्र कुमार साहू पिता प्रसाद साहू (दादा–रोहन साहू) की पीड़ा इस सड़ते सिस्टम की जीता-जागता उदाहरण है।

 

पीड़ित युवक रविंद्र साहू पिछले तीन वर्षों से अपने ही जमीन से जुड़े दस्तावेज पंजी–2 की अभिप्रमाणित प्रति के लिए चतरा जिला मुख्यालय का चक्कर काट रहा है। हर बार उसे लगभग 60 से 70 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, लेकिन हर दौरे के बाद उसे निराशा ही हाथ लगी है।

 

*पहले आवेदन पर टालमटोल, फिर नई शर्तें…*

 

तीन वर्ष पूर्व अभिलेखागार कार्यालय में पंजी–2 के लिए आवेदन दिया गया, लेकिन आवेदन लेने के बजाय सिर्फ तारीखें दी जाती रहीं। बार-बार आने पर कर्मियों ने अंचल अधिकारी की रिपोर्ट लाने को कहा। पीड़ित ने पत्रांक 1452, दिनांक 30/10/2023 को अंचल रिपोर्ट लाकर विधिवत कार्यालय में जमा किया , इसके बावजूद पंजी–2 की प्रमाणित प्रति नहीं दी गई।

 

*नया आवेदन दो’, हर बार वही जवाब…*

 

युवक को किस कदर परेशान किया गया यह विस्तार से बताते है । जब अंचल रिपोर्ट जमा कर दिया तो पीड़ित को दोबारा आवेदन करने को कहा गया । 16/06/2025 को टिकट के साथ आवेदन (आवेदन संख्या 4059) जमा किया । फिर भी कोई कार्रवाई नहीं इसके बाद 15/12/2025 को तीसरा आवेदन (आवेदन संख्या 7180) जमा किया । सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि हर बार आवेदन रजिस्टर में दर्ज कर रजिस्टर संख्या दी गई, फिर भी बार-बार नया आवेदन लेकर पीड़ित को क्यों दौड़ाया गया यह सवाल आप सभी जनता समझ ही रहे है। अभिलेखागार कार्यालय को लेकर पहले प्रकाशित खबरों में जिन गंभीर आरोपों की चर्चा हुई थी, इस मामले ने उनकी सत्यता को और पुख्ता कर दिया है। पूरे प्रकरण में प्रभारी जिला अभिलेखागार पदाधिकारी की भूमिका भी संदेह के घेरे में मानी जा रही है।

 

*बाहर हंगामा, अंदर खामोशी , CCTV खोलेगा राज…..*

 

कार्यालय के बाहर परेशान आवेदकों का हंगामा और अंदर अधिकारी की चुप्पी यदि अभिलेखागार परिसर के CCTV कैमरों की बारीकी से जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

 

*अधिकारी की अमर्यादित भाषा चौकाने वाला…..*

 

प्रभारी अभिलेखागार पदाधिकारी के बाहर निकलने पर एक अन्य युवक ने बताया कि उसने छह माह पहले आवेदन दिया है। इस पर अधिकारी ने अमर्यादित लहजे में कहा अभी छह माह और लगेगा। संयोग से उस समय मैं और पूर्व सांसद प्रतिनिधि मुकेश कुमार भी मौके पर मौजूद थे। इस तरह की भाषा सुनकर वहां मौजूद लोग भी स्तब्ध रह गए।

 

*अब सवाल यह है कि क्या आम नागरिकों को अपने ही दस्तावेज पाने के लिए वर्षों भटकना पड़ेगा? क्या अभिलेखागार कार्यालय सेवा नहीं, शोषण का अड्डा बन चुका है? क्या जिला प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगा?*

 

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं । इन साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह दफन कर दिया जाएगा?

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सबसे ज्यादा पड़ गई