आज सरायकेला-खरसावां जिले के कपाली से आए आदिवासी- मूलवासी समाज के दर्जनों लोगों से मुलाकात हुई। किसी जमाने में वहाँ कपाली पंचायत हुआ करती थी, जिसमें डांगरडीह, बांधगोड़ा, हांसाडूंगरी, केन्दडीह एवं कालियाडूंगरी जैसे गांव हुआ करते थे।
सन 1995 की वोटर लिस्ट देखने पर आपको यहाँ मांझी, टुडू, महतो, मंडल, कुंभकार समेत सिर्फ आदिवासी- मूलवासी समाज के ही वोटर दिखेंगे, एक भी नाम समुदाय विशेष का नहीं मिलेगा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्हीं लोगों ने इनकी जमीन लूट कर, इसे घुसपैठियों की कॉलोनी बना दिया है।
आज इस जगह आदिवासी-मूलवासी समाज के डेढ़-दो हजार भी वोटर नहीं बचे हैं, लेकिन 35,000 से ज्यादा वोटर एक समुदाय विशेष के हैं। कहाँ से आये ये लोग? उन्हें बसाने वाले कौन हैं?
कपाली से जबरन विस्थापित कर दिए गए इन लोगों के पास खतियान है, सभी दस्तावेज हैं, लेकिन सीएनटी एक्ट का उल्लंघन कर इनकी जमीनें हथिया ली गईं। आज अपने ही गांव में, अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक बन चुके इन लोगों का क्या कसूर है? कहां जायें ये लोग?
राज्य सरकार बताए कि किस के संरक्षण में यह गोरखधंधा चल रहा है? वोट बैंक के लिए वहां इन घुसपैठियों को कौन बसा रहा है? इनमें से कई टोलों को रिकॉर्ड्स में गायब कर दिया गया है। क्या बिना सरकारी संरक्षण के यह संभव है?
अगर जिला प्रशासन एवं चुनाव आयोग इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता है तो वहां जनता दरबार लगा कर, सभी खतियानों/ दस्तावेजों की सार्वजनिक किया जायेगा और आगे के आंदोलन की रणनीति तय की जायेगी।





