कई मामलों में विभिन्न हाई कोर्टों एवं सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि ईसाई समाज में कोई जाति नहीं होती, और धर्म बदलने के बावजूद सिर्फ आरक्षण के लिए स्वयं को पुरानी पहचान से जोड़ना, वास्तव में संविधान को धोखा देना है।
किसी भी मंदिर/ मस्जिद/ गुरुद्वारे या चर्च के पास हाथ जोड़ने अथवा सिर झुकाने से आपका धर्म नहीं बदलता। यह आपकी जीवनशैली पर निर्भर करता है। किसी बच्चे के जन्म के समय, शादी के समय या फिर मृत्यु के बाद, आपकी धार्मिक प्रक्रियाएं मांझी बाबा/ पाहन/ पड़हा राजा पूरा करवाते हैं या पादरी? अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिए आप सरना स्थल/ जाहेर स्थान/ देशाउली जाते हैं या फिर चर्च? वही आपकी धार्मिक पहचान है।
अगर आपने धर्म बदल लिया है तो हमें उस से कोई आपत्ति नहीं है, आप अपने धर्म में खुश रहिए, लेकिन हमारे अधिकारों में अतिक्रमण मत करिए। भारत में ईसाई धर्म को अल्पसंख्यक में गिना जाता है, दलित/ आदिवासी में नहीं।
आदिवासी समाज की इस लड़ाई को कुछ लोग जाति एवं धर्म के नाम पर भटकाना चाहते हैं, लेकिन हमारा सवाल एकदम सीधा है – अगर इसी तरह धर्मांतरण चलता रहेगा, तो हमारे सरना स्थलों, जाहेर स्थानों एवं देशाउली में कौन पूजा करेगा? फिर तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।





