Chatra*जिले के अधिकारी ने लिखा , एक भ्रष्ट अधिकारी के हाथों में चतरा का बागडोर तो कैसे होगा विकास ??*

*जिले के अधिकारी ने लिखा , एक भ्रष्ट अधिकारी के हाथों में चतरा का बागडोर तो कैसे होगा विकास ??

 

*प्रतापपुर पंचायत में मनरेगा महाघोटाला “काग़ज़ी तालाब” बनाकर लाखों की खुली लूट ।।*

 

*डिजिटल सिग्नेचर दुरुपयोग कर 17 फर्जी योजनाओं की डिमांड, प्रखंड कार्यालय बना ‘डिजिटल लूट सेंटर ।।*

 

*उपायुक्त कार्रवाई के लिए तत्पर पर दोषियों को बचाने कौन बना ढाल ??*

 

चतरा(संजीत मिश्रा) । आज सुबह ही एक खबर लिखा सुर्खियों से फाइलों तक सिमटती सच्चाई : चतरा में बदलाव की उम्मीद क्यों हर बार दम तोड़ देती है? आप सबों ने पढ़ा कि इस जिले का हालात क्या है और इसके दोषिवार अधिकारी के साथ जनप्रतिनिधि और जनता भी है । जिले में पिछले एक माह से लगातार फर्जीवाड़ा, जालसाजी और सरकारी योजनाओं में लूट के मामले उजागर हो रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक तंत्र अब तक मूकदर्शक के साथ धृतराष्ट्र बना हुआ है। ताज़ा मामला प्रतापपुर पंचायत का है, जहाँ मनरेगा जैसी गरीबों की जीवनरेखा बनी योजना को काग़ज़ी विकास और डिजिटल घोटाले का अड्डा बना दिया गया है। इस जिले में बिना स्थल निरीक्षण, बिना मास्टर रोल और बिना वास्तविक कार्य के रातों-रात 17 तालाब निर्माण योजनाओं की डिमांड सिस्टम में खोल दी गई, और भुगतान की तैयारी कर ली गई। यह कोई तकनीकी चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित डिजिटल डकैती है। ऐसा एक प्रखण्ड नहीं बल्कि सभी प्रखण्डों में कमोबेस ऐसा ही हालात है ।

 

*रोजगार सेवक को भनक तक नहीं, सिस्टम में खुल गई 17 योजनाएँ….*

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायत के रोजगार सेवक को इस पूरे खेल की जानकारी तक नहीं थी। जब उनके नाम से योजनाओं की डिमांड खुलने का मामला सामने आया, तो यह साबित हो गया कि मनरेगा का डिजिटल सिस्टम अंदर से पूरी तरह असुरक्षित है। रोजगार सेवक सुमन ओड़िया ने बीडीओ को लिखित आवेदन देकर स्पष्ट शब्दों में कहा कि

मैंने किसी भी योजना का डिमांड नहीं खोला है। मेरे डिजिटल सिग्नेचर का दुरुपयोग किया गया है। न मैंने स्थल निरीक्षण किया, न किसी कार्य को स्वीकृति दी। यदि भुगतान होता है तो इसकी जिम्मेदारी मेरी नहीं होगी। यह बयान न सिर्फ गंभीर है, बल्कि पूरे प्रखंड स्तर की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

 

*काग़ज़ों में तालाब, ज़मीन पर सन्नाटा…*

 

सिंचाई व्यवस्था के लिए जिन किसानों के नाम पर तालाब निर्माण दिखाकर सरकारी राशि निकालने की साजिश रची गई, उनमें मजराही गाँव — लालू देवी, विशु भारती, किरण देवी सहित 9 लोग गोमे गाँव — जितेंद्र यादव, बैजनाथ यादव सहित 6 किसान , कारुडीह गाँव — अनुज यादव, उषा देवी का नाम है । ग्रामीणों का कहना है कि इन खेतों में न कोई तालाब है, न खुदाई के निशान, फिर भी सरकारी पोर्टल पर काम “स्वीकृत” और “प्रगति पर” दिखाया जा रहा है।

 

 

*कैसे चलता है ‘डिजिटल घोटाले’ का पूरा नेटवर्क…*

 

सूत्रों के अनुसार, यह घोटाला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरा नेटवर्क आधारित खेल है , प्रखंड कार्यालय में बैठे बिचौलिए योजनाओं की “डील” तय करते हैं कंप्यूटर ऑपरेटर के पास कर्मचारियों के डिजिटल सिग्नेचर (DSC) रहते हैं । कमीशन के बदले फर्जी योजनाओं की एंट्री की जाती है । बिना जमीन पर काम कराए भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी जाती है । ऐसे में सरकारी सॉफ्टवेयर में सेंधमारी कर केन्द्र व राज्य के खजाने को चूना लगाने की साजिश लगातार जारी है।

 

*डीडीसी ने मानी गड़बड़ी, पर कार्रवाई कब?….*

 

डीडीसी चतरा अमरेंद्र कुमार सिन्हा ने मामले की गंभीरता स्वीकार करते है । और एक बार नहीं कई गम्भीर गड़बड़ियों एवं जालसाजी में मामले उन तक आया है पर करवाई किन-किन दोषियों पर किया गया ये तो वही बता सकते है । डीसीसी ने इस मामले में वही कहा जो पहले भी कहते आये है । प्राथमिक जांच में कुछ कंप्यूटर ऑपरेटरों और कर्मियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। रिपोर्ट उपायुक्त को भेज दी गई है। प्रतापपुर का मामला अकेला नहीं है, कई पंचायतों में इसी तरह का खेल चल रहा है। हालाँकि सवाल यह है कि सिर्फ रिपोर्ट भेजने से घोटाले रुकेंगे या जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई भी होगी?

 

*लगातार खुल रहे घोटाले, फिर भी चुप्पी क्यों?….*

 

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हर साल मनरेगा में घोटाले उजागर होते हैं । जांच के आदेश होते हैं ।लेकिन कार्रवाई फाइलों में ही दफन रह जाती है । यही वजह है कि घोटालेबाजों का हौसला चरम पर है। अब सबसे बड़े सवाल यह है कि जब शिकायतें पहले भी हुईं, तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? डिजिटल सिग्नेचर जैसे संवेदनशील सिस्टम की सुरक्षा आखिर किसके भरोसे है? क्या इस घोटाले में शामिल अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आएँगे? जनता के बीच यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि दिखावटी जाँच और सख़्त कार्रवाई के खोखले बयानों को सुनते-सुनते कान थक चुके हैं और आँखें अब सुन्न पड़ चुकी हैं।

 

 

मनरेगा गरीबों के रोजगार की योजना है, न कि भ्रष्टाचारियों के लिए कमाई का लाइसेंस।

 

अब सवाल यह नहीं कि घोटाला हुआ या नहीं, सवाल यह है कि क्या इस बार दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी, या यह मामला भी बाकी घोटालों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा ?

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