झारखण्ड :समाज के अंतिम पायदान पर बैठा व्यक्ति भी विकास के दौर में शामिल हो सके, इसके लिए जेसीआई रांची को गांवों तक जाकर जनजातीय समुदाय को भी भागीदार बनाना चाहिए. देश तभी विकसित होगा, जब समाज का हर वर्ग विकसित होगा. इसके लिए हमें प्रयास करना होगा. बाधाएं भी आ सकती हैं, लेकिन इन्हें पार कर विकास के लिए नये आयाम स्थापित करने वालों की ही विशिष्ट पहचान होती है. को राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने मोरहाबादी मैदान में जेसीआई रांची द्वारा आयोजित एक्सपो उत्सव में ये बातें कहीं. औद्योगिक विकास से रोजगार का होता है सृजन उन्होंने कहा, औद्योगिक विकास से रोजगार का सृजन होता है. खनिज प्रदेश होने से झारखंड में उद्योगों के विकास की बड़ी संभावनाएं हैं. नई सोच, नई अवधारणाएं व नए प्रयोगों के साथ राज्य व देश को आगे बढ़ाने का काम युवा कंधों पर है.राज्यपाल बोले, इस तरह के आयोजन से नए व्यवसायियों, उद्यमियों व अलग-अलग क्षेत्रों में नवाचार करने वालों को एक्सपोजर मिलता है. इस तरह के कार्यक्रम के जरिए वे लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें व्यवसाय को बढ़ाने में मदद मिलती है. उन्होंने कहा कि पूरा विश्व एक तरह से ग्लोबल विलेज बन गया है. वैश्वीकरण के इस दौर में विकास के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल होना होगा. नित्य नए विकसित हो रही नई तकनीक, नए उत्पाद एवं नवोन्मेषी विचार को अपनाना होगा. जेसीआई रांची द्वारा आयोजित यह एक्सपो उत्सव तक चलेगा. सुबह 11 से रात 9 बजे तक लोग यहां खरीदारी कर सकते हैं. इंट्री शुल्क 20 रुपये है. एक्सपो में हर दिन अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाएगा. इस कड़ी में को एक्सपो परिसर में मिसेज एक्सपो का आयोजन किया गया.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सेम सेक्स मैरिज या समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया है। 5 जजों की पीठ ने यह फैसला सुनया, जिसमें भारत के मु्ख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस एस रवींद्र भट्ट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल रहे। खास बात है कि बेंच ने पहले ही साफ कर दिया है कि यह मामला स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के दायरे में रहेगा। कोर्ट ने 11 मई को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

फैसले में जस्टिस कोहली, जस्टिस भट्ट और जस्टिस नरसिम्हा की राय CJI चंद्रचूड़ और जस्टिस कौल से अलग रही। ऐसे में मामला 3-2 को हो गया और अदालत ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया।

मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने साफ कर दिया है कि अदालत की तरफ से कानून नहीं बनाया जा सकता और विशेष विवाह अधनियिम (SMA) में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। खास बात है कि कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि समलैंगिक विवाह स्पेशल मैरिज एक्ट के ही दायरे में रहेगी।

CJI ने कहा कि यह संसद को देखना होगा कि SMA में बदलाव की जरूरत है या नहीं। उन्होंने कहा, ‘यह अदालत कानून नहीं बना सकती। यह केवल उसके बारे में बता सकती है और उसे प्रभाव में ला सकती है।’ उन्होंने बताया कि अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का बयान रिकॉर्ड कर लिया है, जिसमें उन्होंने क्वीर यूनियन में शामिल लोगों के अधिकार तय करने के लिए समिति गठित करने की बात कही थी।

उन्होंने इस दौरान सरकार को भी समलैंगिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाने के निर्देश सरकार को दिए हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिस को भी समलैंगिक जोड़े के खिलाफ उनके रिश्ते को लेकर शुरुआती जांच के बाद ही FIR दर्ज करनी होगी। उन्होंने कहा कि समलैंगिकता शहरी या अपर क्लास तक सीमित नहीं है।

अपने फैसले में सीजेआई ने कहा कि मौजूदा कानूनों के तहत हेट्रोसेक्शुअल संबंधों (हेट्रोसेक्शुअल यानी ऐसा रिश्ता जिसमें शामिल व्यक्ति विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होता है) में शामिल ट्रांसजेंडर को शादी करने का अधिकार होता है। उन्होंने कहा कि क्वीर कपल समेत अविवाहित लोग साझा तौर पर बच्चे को गोद भी ले सकते हैं। अब तक अविवाहित जोड़े के बच्चा गोद लेने पर रोक थी।

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