भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा में स्थान मिलना महत्वपूर्ण पहल : कुलाधिपति
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान प्रणाली के ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य में उसकी बढ़ती प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है। उन्होंने औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था पर पड़े प्रभावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः शैक्षणिक विमर्श के केंद्र में लाने की आवश्यकता है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षा संस्थानों में शामिल किए जाने की पहल का स्वागत किया और इसके लिए प्रधानमंत्री के प्रयासों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने तक विकसित भारत का संकल्प साकार करने में भारतीय ज्ञान प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। साथ ही उन्होंने झारखंड के विकास एवं समृद्धि के संकल्प को भी रेखांकित किया। अपने काव्यात्मक विचारों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक चेतना, रचनात्मकता और विचारों की स्वतंत्रता का संदेश दिया।
भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित हैं जीवन और विश्व की समस्याओं के समाधान
कोल्हान विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ० रागिनी भूषण ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और वर्तमान समय की समस्याओं के बीच गहरा संबंध है। उन्होंने वेदों एवं उपनिषदों में निहित ज्ञान की व्यापकता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों का गंभीर अध्ययन वर्तमान समाज को अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर नई दृष्टि प्रदान कर सकता है।
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक एवं झारखंड विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति के अध्यक्ष माननीय श्री सरयू राय ने अपने विस्तृत संबोधन में भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने के लिए संश्लेषण और विश्लेषण के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए उसके मूल विचारों, दर्शन और व्यापक संदर्भों का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने 84 लाख योनियों की भारतीय दार्शनिक अवधारणा, आदि शंकराचार्य के दर्शन, शून्य की अवधारणा तथा भारतीय और वैश्विक ज्ञान परंपराओं के परस्पर संबंधों पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने स्वामी विवेकानंद, रामायण और महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भारतीय ग्रंथों में निहित जीवन-दर्शन, ऊर्जा, तकनीकी ज्ञान और नैतिक मूल्यों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखते हुए आधुनिक समस्याओं के समाधान के लिए उसका उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने ज्ञान और बाजार के बीच बदलते संबंधों पर भी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यावसायिक लाभ नहीं, बल्कि समाज का कल्याण और मानवीय मूल्यों का विकास होना चाहिए। उन्होंने तुलसीदास सहित भारतीय साहित्यिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए अपने विचारों को विराम दिया।
शोध एवं अकादमिक संवाद को मिला नया आयाम
सेमिनार के दौरान सभी वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि, समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में उसकी उपयोगिता तथा उच्च शिक्षा में भारतीय बौद्धिक विरासत के अध्ययन की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़कर नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
इस राष्ट्रीय सेमिनार ने शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान और वैश्विक परिवर्तन से जुड़े विषयों पर विचारों के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान किया। साथ ही भारतीय ज्ञान प्रणाली और समकालीन वैश्विक चिंतन के बीच अकादमिक संवाद को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।
कार्यक्रम के अंत में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन डॉ. कंचन सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके पश्चात राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रगान के साथ उद्घाटन सत्र का समापन हुआ। कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों ने समूह छायाचित्र लिया।
सोना देवी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित यह दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार भारतीय ज्ञान प्रणाली की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करने, शोध एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यापक अकादमिक मंच प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास रहा।





