पाकिस्तानी कबायली हमले के सामने चट्टान बनकर खड़े हुए ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ दुश्मन की बढ़त रोककर इतिहास की दिशा बदल दी। उनका अदम्य साहस जम्मू-कश्मीर की रक्षा और भारतीय सैन्य परंपरा का स्वर्णिम अध्याय है।भारत के इतिहास में कुछ ऐसे वीर योद्धा हुए हैं, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस और कर्तव्यनिष्ठा की अमिट मिसाल कायम की। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ऐसे ही वीर सपूत थे, जिन्हें जम्मू-कश्मीर का रक्षक कहा जाता है। वर्ष 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमण के दौरान उन्होंने सीमित संसाधनों और कम सैनिकों के बावजूद दुश्मन की प्रगति रोकने के लिए अद्वितीय वीरता दिखाई। उनका बलिदान श्रीनगर और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से को बचाने के संघर्ष में निर्णायक साबित हुआ है।
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का जन्म 14 जून 1899 को जम्मू क्षेत्र के बागूना गांव में एक सैन्य डोगरा राजपूत परिवार में हुआ था। यह गांव आज सांबा जिले में राजेंद्रपुरा के नाम से जाना जाता है। उनके परिवार की कई पीढ़ियों ने सैन्य सेवा में योगदान दिया था। उनके पूर्वज जनरल बाज सिंह महाराजा गुलाब सिंह की सेना में सेवा कर चुके थे। उनके दादा हमीर सिंह और पिता सूबेदार लाखा सिंह भी सैन्य अनुभव रखने वाले योद्धा थे।बचपन से ही राजेंद्र सिंह का पालन-पोषण उनके चाचा लेफ्टिनेंट कर्नल गोविंद सिंह ने किया। परिवार के सैन्य वातावरण और वीरता की परंपरा ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने जम्मू के प्रिंस ऑफ वेल्स कॉलेज, जिसे आज जीजीएम साइंस कॉलेज के नाम से जाना जाता है, से वर्ष 1921 में स्नातक की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर रियासत की सेना में अपनी सेवाएं दीं और धीरे-धीरे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते हुए ब्रिगेडियर के पद तक पहुंचे।
1947 का संकट और जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण
भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर रियासत के सामने अपने भविष्य का निर्णय करने की चुनौती थी। महाराजा हरि सिंह प्रारंभ में रियासत की स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने के विकल्प पर विचार कर रहे थे। इसी राजनीतिक अनिश्चितता के बीच पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर पर दबाव बढ़ाया गया।
22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया। इन आक्रमणकारियों का उद्देश्य तेजी से आगे बढ़कर श्रीनगर पर कब्जा करना और रियासत को भारत से जुड़ने का अवसर मिलने से पहले ही स्थिति अपने पक्ष में करना था। हमलावर मुजफ्फराबाद की दिशा से आगे बढ़े और उड़ी होते हुए बारामूला की ओर बढ़ने लगे।उस समय जम्मू-कश्मीर की रियासती सेना संख्या और हथियारों के लिहाज से सीमित थी। श्रीनगर की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती दुश्मन की बढ़त को रोकना था। यदि आक्रमणकारी बिना किसी बड़ी रुकावट के बारामूला पार कर श्रीनगर पहुंच जाते, तो राजधानी पर कब्जे का खतरा गंभीर हो सकता था।
लगभग 200 सैनिकों के साथ मोर्चे पर पहुंचे
महाराजा हरि सिंह ने संकट की गंभीरता को समझते हुए अपनी सेना के वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की बढ़त रोकने का आदेश दिया। उन्होंने लगभग 200 सैनिकों के साथ मोर्चा संभाला। उनका उद्देश्य दुश्मन को निर्णायक रूप से पराजित करना भर नहीं था, बल्कि उसे यथासंभव अधिक समय तक रोकना था, ताकि रियासत को संभलने और आवश्यक कदम उठाने का अवसर मिल सके।उड़ी और बारामूला के बीच का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। वहां स्थित महुरा बिजलीघर श्रीनगर को बिजली आपूर्ति करता था। इस क्षेत्र पर हमलावरों का कब्जा होने से राजधानी की स्थिति और अधिक संकटपूर्ण हो गई। बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटना ने भी खतरे की गंभीरता को उजागर किया।
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने अपने सैनिकों के साथ दुश्मन की गतिविधियों का आकलन किया। विरोधी पक्ष संख्या में अधिक था और उसे आसपास की पहाड़ियों से गोलीबारी करने का लाभ मिल रहा था। परिस्थितियां कठिन थीं, लेकिन ब्रिगेडियर ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने सैनिकों में विश्वास जगाया और उन्हें समझाया कि उनकी लड़ाई केवल एक सैन्य चौकी के लिए नहीं, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर के भविष्य के लिए है।
पुल को नष्ट करने की योजना और अदम्य साहस
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा उड़ी और बारामूला के बीच दुश्मन की आवाजाही को बाधित करना था। इस मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पुल था। यदि पुल को नष्ट कर दिया जाता, तो आक्रमणकारियों की आगे बढ़ने की गति धीमी की जा सकती थी। हालांकि, पुल मजबूत लोहे और सीमेंट से बना था तथा उसे उड़ाने के लिए आवश्यक विस्फोटक उपलब्ध नहीं थे।इसके बावजूद रियासती सैनिकों ने आसपास मोर्चे संभाल लिए। पहाड़ियों पर तैनात दुश्मन ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस मुठभेड़ में कई सैनिक हताहत हुए, लेकिन ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह विभिन्न मोर्चों पर जाकर अपने जवानों का उत्साह बढ़ाते रहे। वे स्वयं भी गोली लगने से घायल हो गए, फिर भी उन्होंने नेतृत्व करना नहीं छोड़ा।
युद्ध की परिस्थितियों को देखते हुए पीछे हटने की योजना बनानी पड़ी। लेकिन दुश्मन ने रास्ते में पत्थर और पेड़ डालकर आवाजाही बाधित कर दी थी। सैनिकों को इन अवरोधों को पार करते हुए आगे बढ़ना पड़ा। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह की जांघों में गोलियां लगी थीं, जिसके कारण उनके लिए खड़ा होना भी कठिन हो गया था। एक सैनिक ने उन्हें उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास किया, लेकिन वह भी गोली का शिकार हो गया।अत्यंत गंभीर स्थिति में भी ब्रिगेडियर ने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा। इसी संघर्ष के दौरान 26 अक्टूबर 1947 को वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनका बलिदान उस समय हुआ, जब जम्मू-कश्मीर का भविष्य निर्णायक मोड़ पर था।
उनके बलिदान ने बदल दी घटनाओं की दिशा
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके सैनिकों का संघर्ष दुश्मन की बढ़त को रोकने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। हालांकि उड़ी और बारामूला अंततः आक्रमणकारियों के कब्जे में चले गए, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने में लगा समय श्रीनगर की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद भारतीय सैन्य सहायता का मार्ग प्रशस्त हुआ। 27 अक्टूबर को भारतीय सेना की टुकड़ियां श्रीनगर पहुंचीं और आक्रमणकारियों के विरुद्ध अभियान शुरू किया। इस प्रकार ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके साथियों के प्रतिरोध ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण समय उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाई।
मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह की असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान को देश ने सम्मान दिया। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है। उन्हें यह सम्मान जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए उनके साहसपूर्ण नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा के लिए प्रदान किया गया।उनकी स्मृति जम्मू-कश्मीर के इतिहास और भारतीय सैन्य परंपरा में आज भी जीवित है। उनका पैतृक गांव राजेंद्रपुरा के नाम से जाना जाता है, जो उनकी वीरता की याद दिलाता है।ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि किसी राष्ट्र की रक्षा केवल हथियारों और सैनिकों की संख्या से नहीं होती, बल्कि नेतृत्व, साहस, अनुशासन और मातृभूमि के प्रति समर्पण से भी होती है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और अपने प्राणों की परवाह किए बिना दुश्मन को रोकने का प्रयास किया।
26 अक्टूबर का बलिदान दिवस हमें उस वीर सेनानायक को स्मरण करने का अवसर देता है, जिसने जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका नाम भारतीय इतिहास में सदैव सम्मान के साथ लिया जाएगा। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का बलिदान देशवासियों को यह संदेश देता है कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा सर्वोपरि है तथा मातृभूमि की रक्षा के लिए किया गया सर्वोच्च त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।






