आज स्वदेशी मेले में मेहंदी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 70 महिलाओं ने भाग लिया। सनातन संस्कृति एवं नई चेतना के विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

आज स्वदेशी मेले में मेहंदी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 70 महिलाओं ने भाग लिया। सनातन संस्कृति एवं नई चेतना के विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ।
सांस्कृतिक संध्या में बताओ मुख्य अतिथि हिंदुस्तान अखबार के संपादक श्री गणेश मेहता जी, भाजपा के जिला अध्यक्ष सुधांशु ओझा जी, चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष मानव केडिया एवं सचिव पुनीत कौनटिया उपस्थित रहे।

हिंदुस्तान के संस्थापक गणेश मेहता जी ने इस आयोजन के सभी आयोजकों को हृदय से धन्यवाद दिया । आज के समय में, जब ऑनलाइन मार्केट और भौतिकवाद हम पर हावी हैं, तब भी स्वदेशी ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है — यह वास्तव में प्रशंसनीय है।
जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में कहा था — “आत्मा कभी मरती नहीं है।” अगर हम यह मानें कि हमारा शरीर पूरे देश के समान है, तो ‘स्वदेश’ हमारी आत्मा है। इस भौतिक जगत में जितनी भी चीज़ें हमें दिखाई देती हैं, वह शरीर के समान हैं, पर स्वदेश उसकी आत्मा है। इसलिए हमें इस स्वदेशी रूपी आत्मा को जीवित रखना ही होगा।

अगर हमें देश का समग्र विकास चाहिए, तो स्वदेशी को बचाना और बढ़ाना होगा। भले ही दशकों बीत गए हों, पर जो जीवन का सूत्र हमारे पूर्वजों ने दिया था — वह आज भी उतना ही प्रासंगिक, मान्य और उपयोगी है।
इसलिए मैं पुनः कहना चाहूँगा —
“हमारी हस्ती मिटती नहीं है।”

भारत आरंभ से ही अपने स्वदेशी भाव और ग्राम्य परिवेश के लिए जाना जाता रहा है।
भा ज पा जिला अध्यक्ष सुधांशु ओझा ने कहा कि आज दुनिया के शीर्ष देशों में भारत का नाम लिया जा रहा है। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि कभी वह देश — ब्रिटेन, जिसके बारे में कहा जाता था कि “जहाँ सूरज कभी अस्त नहीं होता” — उससे हमने आज़ादी बड़ी कठिन लड़ाई के बाद हासिल की थी।और आज, वही राष्ट्र तो बहुत पीछे छूट चुका है, पर चीन जैसे देश आगे बढ़ गए हैं। इसका अर्थ यह है कि कहीं न कहीं हमसे कुछ भूलें हुई हैं। हमने अपने कार्यों को उतनी गंभीरता और समझदारी से नहीं निभाया जितनी आवश्यकता थी। इसी बात को गहराई से समझने के लिए ‘स्वदेशी’ की अवधारणा सामने आती है।

जब हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विदेशों से वस्तुएँ खरीदते हैं, तो वास्तव में हम अपनी ही अर्थव्यवस्था को कमजोर करते हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश ने यह संकल्प लिया है कि —
“हम वही वस्तुएँ उपयोग करेंगे जो हमारे देश में निर्मित हों।”

जब तक हम इस प्रकार की संगठित सोच के साथ कार्य नहीं करेंगे, तब तक राष्ट्र का संपूर्ण विकास संभव नहीं है।
स्वदेशी केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक मानसिकता है।
स्वदेशी का अर्थ है — देश के लिए, देश में और देश द्वारा निर्मित हर वस्तु का सम्मान।
आज “स्वदेशी मेला” इस भावना का जीवंत उदाहरण है।

अब देश का शासन, प्रशासन और जनमानस — सभी स्वदेशी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
हमारे सैनिकों की बुलेटप्रूफ जैकेट, हमारे उद्योगों की मशीनें, और हमारे जीवन की हर आवश्यक वस्तु — सब कुछ स्वदेशी बन रहा है।
आइए, हम सब संकल्प लें कि इस आंदोलन को और मज़बूत बनाएँगे,
और “आत्मनिर्भर भारत” के सपने को साकार करेंगे।

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