समाज के कई क्षेत्रों में प्रगति के बावजूद दिव्यांग व्यक्तियों के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं। केंद्रीय बजट में दिव्यांगों के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके कारण उनकी समस्याओं का समाधान अधूरा रह जाता है। स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, और यहां तक कि बुनियादी खाद्य आपूर्ति तक पहुंचने में भी उन्हें लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ता है। एक कारण यह हो सकता है कि दिव्यांगता को ‘कल्याण’ और ‘लागत-आधारित दृष्टिकोण’ से देखा जाता है, जिससे कुछ कल्याणकारी योजनाओं के लिए सीमित वित्तीय संसाधन आवंटित किए जाते हैं। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में दीर्घकालिक ‘निवेश’ की आवश्यकता को नजरअंदाज करता है। शारीरिक अक्षमता से जुड़े मुद्दों को केवल सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए मानव पूंजी के योगदान को भी साकारात्मक रूप में समझने की जरूरत है। इस दिशा में एक दीर्घकालिक और समग्र दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।
सुदीप्ता दास, असिस्टेंट प्रोफेसर, ग्रेजुएट कॉलेज, वाणिज्य विभाग






