आजाद हिन्द सरकार की स्थापना: विदेश की धरती से स्वतंत्रता का पहला संगठित प्रयास
स्थापना दिवस विशेष | 29 अक्टूबर
भारत की आजादी के लिए विदेशी धरती पर गठित हुई थी अस्थायी आजाद हिन्द सरकार, राजा महेन्द्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्ला और मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी ने निभाई थी अहम भूमिका।
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल देश के भीतर हुए आंदोलनों, सत्याग्रहों और क्रांतिकारी संघर्षों तक सीमित नहीं है। देश से हजारों किलोमीटर दूर विदेशी धरती पर भी अनेक राष्ट्रभक्त भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए प्रयासरत थे। इन क्रांतिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आजादी के पक्ष में समर्थन जुटाने, हथियारों की व्यवस्था करने और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की योजना बनाने का प्रयास किया। इसी क्रम में 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अस्थायी आजाद हिन्द सरकार की स्थापना हुई। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में विदेश की धरती पर स्वतंत्र सरकार स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।
बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा था। एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में आगे चलकर जनआंदोलन विकसित हुए, वहीं दूसरी ओर अनेक क्रांतिकारी सशस्त्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने की रणनीति बना रहे थे। उनका मानना था कि ब्रिटेन के विरोधी देशों का सहयोग प्राप्त करके भारत की स्वतंत्रता के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाई सकती हैं।इसी उद्देश्य से राजा महेन्द्र प्रताप सिंह यूरोप में सक्रिय हुए। वे जर्मनी से समर्थन प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करने और अफगानिस्तान के रास्ते भारत की स्वतंत्रता के लिए अभियान चलाने की योजना बनाई। इस कार्य में सहयोग के लिए उन्होंने मौलाना मोहम्मद बरकतुल्ला को भी बर्लिन बुलाया। बरकतुल्ला इससे पहले जापान में सक्रिय थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें वहां से निकलना पड़ा था।
जर्मनी और तुर्की से सहयोग की कोशिश
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बर्लिन भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में एक दल गठित किया गया, जिसमें मौलाना बरकतुल्ला के अलावा वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय के नेतृत्व वाले क्रांतिकारी समूह के सदस्य भी शामिल थे। इस दल ने जर्मनी के सम्राट कैसर विल्हेल्म द्वितीय से मुलाकात कर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।इसके बाद राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल तुर्की की ओर बढ़ा। इस यात्रा का उद्देश्य भारत की आजादी के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना और ब्रिटिश विरोधी शक्तियों से सहयोग प्राप्त करना था। प्रतिनिधिमंडल ने तुर्की के नेताओं से संपर्क किया। इस दौरान मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी भी स्वतंत्रता के इस अभियान से जुड़े। अंततः यह दल अक्टूबर 1915 में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचा।
29 अक्टूबर 1915 को आजाद हिन्द सरकार की स्थापना
उस समय अफगानिस्तान पर अमीर हबीबुल्ला खान का शासन था। भारत से आए क्रांतिकारियों ने उनसे मुलाकात कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने अभियान के लिए सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। अफगानिस्तान की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए यह क्षेत्र भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए विशेष महत्व रखता था। यहां से भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा तक पहुंचने और सीमावर्ती क्षेत्रों में गतिविधियां संचालित करने की संभावना थी।
इसी पृष्ठभूमि में 29 अक्टूबर 1915 को काबुल में अस्थायी आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई। राजा महेन्द्र प्रताप को इसका राष्ट्रपति बनाया गया, जबकि मौलाना मोहम्मद बरकतुल्ला ने प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला। मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी को गृहमंत्री और डॉ. चम्पकरमण पिल्लै को विदेश मंत्री के रूप में जोड़ा गया।इस सरकार का मूल उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना और स्वतंत्र भारत की एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था का विचार दुनिया के सामने रखना था। यह केवल प्रतीकात्मक घोषणा नहीं थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और स्वतंत्रता के लिए संगठित प्रयास करने की एक व्यापक योजना का हिस्सा थी।
सशस्त्र संघर्ष की योजना और चुनौतियां
आजाद हिन्द सरकार ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की संभावनाओं पर भी काम किया। सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों को संगठित करने तथा सैनिक सहयोग प्राप्त करने के प्रयास किए गए। क्रांतिकारियों की योजना थी कि अफगानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश कर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी जाए।हालांकि, इस अभियान के सामने अनेक कठिनाइयां थीं। अफगानिस्तान की अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक मजबूरियां थीं। अमीर हबीबुल्ला खान ब्रिटेन के साथ सीधे टकराव से बचना चाहते थे। दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए थी। पर्याप्त हथियारों, संसाधनों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी ने भी क्रांतिकारियों की योजनाओं को प्रभावित किया।
इन परिस्थितियों के कारण आजाद हिन्द सरकार अपने उद्देश्य को व्यावहारिक रूप से हासिल नहीं कर सकी। इसके बावजूद इस प्रयास ने यह संदेश दिया कि भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का भी हिस्सा बन सकता है।
राजा महेन्द्र प्रताप का त्याग और संघर्ष
राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जीवन देश की स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा राष्ट्रीय स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी। अफगानिस्तान में आजाद हिन्द सरकार की स्थापना के बाद भी उन्होंने विभिन्न देशों की यात्रा कर भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास जारी रखा।वे रूस सहित अन्य देशों के नेताओं से संपर्क स्थापित करना चाहते थे, ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल सके। इस अभियान में अनेक भारतीय क्रांतिकारियों को कठिनाइयों, गिरफ्तारी और यातनाओं का सामना करना पड़ा। कुछ स्वतंत्रता सेनानियों को अपने प्राणों का बलिदान भी देना पड़ा।इन प्रयासों का तत्काल परिणाम भले ही भारत की स्वतंत्रता के रूप में सामने नहीं आया, लेकिन इन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष और समर्पण की प्रेरणा छोड़ी।
स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण अध्याय
भारत की आजादी का इतिहास अनेक धाराओं के संगम से बना है। देश के भीतर जनआंदोलन चल रहे थे, वहीं विदेशों में रह रहे क्रांतिकारी भी ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने के लिए सक्रिय थे। काबुल में स्थापित आजाद हिन्द सरकार इसी अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी प्रयास का महत्वपूर्ण उदाहरण थी।बाद के वर्षों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द आंदोलन और आजाद हिन्द फौज ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई पहचान दी। हालांकि, 1915 में काबुल में स्थापित आजाद हिन्द सरकार और नेताजी के नेतृत्व में गठित आजाद हिन्द सरकार अलग-अलग ऐतिहासिक प्रयास थे। दोनों के उद्देश्य में भारत की स्वतंत्रता प्रमुख थी, लेकिन उनकी परिस्थितियां, नेतृत्व और कार्यपद्धति अलग थीं।29 अक्टूबर का दिन हमें राजा महेन्द्र प्रताप, मौलाना मोहम्मद बरकतुल्ला, मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी और उन सभी क्रांतिकारियों के योगदान को याद करने का अवसर देता है, जिन्होंने विदेशी धरती पर रहकर भी भारत की आजादी का सपना जीवित रखा। उनका संघर्ष बताता है कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि असंख्य लोगों के त्याग, साहस और अटूट राष्ट्रभक्ति का परिणाम थी।






