
देवघर के पंसारी गांव में किसानों ने अपनाई डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक, 70 एकड़ तक पहुंचा रकबा; पानी और मजदूरी की बचत से बढ़ी खेती की दक्षतारांची: बदलते मौसम और अनिश्चित मानसून का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। बेमौसम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों के बीच बारिश पर निर्भर किसानों के सामने सिंचाई की बढ़ती लागत और मजदूरी बड़ी चुनौती बन गई है। झारखंड के देवघर जिले के पंसारी गांव में किसानों ने तकनीक की मदद से इस चुनौती का समाधान तलाशा है।मानसून पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौतीपंसारी में दशकों से धान की खेती मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर रही है। बारिश समय पर नहीं होने पर किसानों को ट्यूबवेल, पंप और अन्य सिंचाई संसाधनों का सहारा लेना पड़ता था। इससे खेती की लागत बढ़ती गई और किसानों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ा।किसान अवध बिहारी सिंह ने अपनाया डीएसआरपंसारी के किसान अवध बिहारी सिंह ने बेहतर समाधान की तलाश में स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वैज्ञानिक से सलाह ली। इसी दौरान उन्हें डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक की जानकारी मिली। इसमें धान की पारंपरिक रोपाई के बजाय बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं।
इस तकनीक से पानी और मजदूरी की जरूरत कम होती है। किसानों के अनुभव के मुताबिक डीएसआर से 35 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत हुई और खेती की कुल लागत व श्रम आवश्यकता में कमी आई।बायर डायरेक्टएकर्स से मिला तकनीकी सहयोगकृषि वैज्ञानिक के माध्यम से सिंह को बायर डायरेक्टएकर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया। यहां उन्हें कृषि सलाह, मशीनीकरण में सहयोग, स्थानीय रिटेलर्स से संपर्क और डिजिटल टूल्स की सुविधा मिली। साल 2024 में दो एकड़ से शुरू हुआ डीएसआर का प्रयोग 2025 तक पूरे गांव में फैल गया और इसका रकबा बढ़कर 70 एकड़ तक पहुंच गया।सीड ड्रिल मशीन बनी बदलाव का माध्यम
डायरेक्टएकर्स के डीना व्हाट्सऐप चैटबॉट के जरिए सिंह स्थानीय रिटेलर्स से जुड़े और डीएसआर के लिए जरूरी उपकरणों की जानकारी हासिल की। इसके बाद उन्होंने सीधी बुवाई के लिए सीड ड्रिल मशीन खरीदी। उन्होंने अपनी मशीन से दूसरे किसानों के खेतों में भी बुवाई कराई। इससे डीएसआर तकनीक तेजी से गांव में फैली और सिंह के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी तैयार हुआ।एक किसान की पहल से पूरे गांव में बदलावडीएसआर अपनाने के बाद खेतों में फसल की स्थिति बेहतर हुई, पानी की खपत कम हुई और उत्पादन में भी सुधार दर्ज किया गया। दूसरे किसानों ने भी इन परिणामों को देखकर तकनीक अपनानी शुरू की।
पंसारी की कहानी दिखाती है कि तकनीक, वैज्ञानिक सलाह और किसानों के सहयोग से पारंपरिक चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है। अवध बिहारी सिंह की पहल ने न केवल उनकी खेती को बदला, बल्कि पूरे गांव को अधिक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल धान की खेती की दिशा में आगे बढ़ाया।



