टाटा स्टील की पहल से निखर रहीं खेल प्रतिभाएं, अंतरराष्ट्रीय मंच में मिल रही नई पहचान चैंपियन सिर्फ पोडियम पर नहीं बनते। पोडियम तो वह जगह है, जहाँ दुनिया उनकी सालों की मेहनत, अनुशासन, लगन, हौसले और दृढ़ संकल्प को देख पाती है। एक चैंपियन बनने के पीछे होते हैं अभ्यास के अनगिनत घंटे, अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने का जज़्बा और सबसे बढ़कर, अपनी क्षमता को पहचानने और उसे निखारने के मौके। इसी सोच के साथ टाटा स्टील दशकों से खेलों को बढ़ावा देती आ रही है। कंपनी का मानना है कि खेल सिर्फ जीतने के लिए नहीं हैं, बल्कि ये जीवन जीने का एक तरीका हैं। यह सोच सिर्फ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान करने तक सीमित नहीं है। इसका मकसद ऐसा माहौल तैयार करना है, जहाँ हर किसी की प्रतिभा को पहचाना जा सके, उसे निखरने का मौका मिले और वह अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ सके। जहाँ किसी युवा को पहली बार निशाना लगाने, पहली बार चढ़ाई करने और शायद अपने भीतर एक ऐसा सपना देखने का मौका मिले, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी न हो। हम चैंपियन तलाशते नहीं हैं, बल्कि ऐसा माहौल तैयार करते हैं, जहाँ चैंपियन खुद उभरकर सामने आते हैं। इस सोच की झलक भारतीय खेलों की कई पीढ़ियों में देखने को मिलती है। 1996 में जमशेदपुर के जेआरडी टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में स्थापित टाटा आर्चरी अकादमी आज देश में तीरंदाजी के क्षेत्र की एक अहम संस्था बन चुकी है। अकादमी ने अब तक नौ ओलंपियन, नौ अर्जुन पुरस्कार विजेता और 150 से अधिक अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज तैयार किए हैं। इसकी उपलब्धियों की कहानी उन खिलाड़ियों की कई पीढ़ियों में दिखाई देती है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है। एशियाई खेलों में यह सफर करीब दो दशकों से जारी है। 2006 में दोहा में जयंत तालुकदार के कांस्य पदक से शुरू हुआ यह सिलसिला 2010 में ग्वांगझू में मिले कई कांस्य पदकों और 2023 में हांगझोऊ में महिला टीम के कांस्य पदक तक पहुँचा। इस दौरान अकादमी से जुड़े तीरंदाजों ने एशियाई स्तर पर भारत की सफलता में अहम योगदान दिया है। 2026 में अंकिता भकत ने आइची-नागोया में भारत की स्वर्ण पदक जीतने वाली महिला रिकर्व टीम का हिस्सा बनकर इस विरासत को आगे बढ़ाया। लगातार एशियाई खेलों में कांस्य से स्वर्ण तक का उनका सफर दिखाता है कि लगातार मेहनत, सही मार्गदर्शन और बेहतर प्रदर्शन की लगन से कितनी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। लेकिन खेलों की विरासत सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि कितने चैंपियन तैयार हुए हैं, बल्कि इससे भी बनती है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कितने नए अवसर तैयार किए गए हैं। टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन (TSAF) के माध्यम से स्पोर्ट क्लाइंबिंग इस सोच का एक और उदाहरण बनकर उभरी है। वर्ष 2015 से अब तक, 16 जमीनी स्तर के केंद्रों के नेटवर्क के जरिए करीब 1,000 युवाओं को इस खेल से जोड़ा गया है। इन केंद्रों ने शुरुआती स्तर पर खेल से जुड़ने से लेकर विशेष प्रशिक्षण और उच्च स्तर की तैयारी तक पहुँचने का रास्ता तैयार किया है। इसका असर 2026 के एशियन गेम्स में भी देखने को मिला, जहाँ जोगा पूर्ति और दीपु मल्लेश ने स्पीड क्लाइंबिंग के फाइनल राउंड में जगह बनाई। इस दौरान दोनों ने क्रमशः 7.28 सेकंड और 5.09 सेकंड का समय लेकर नए भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए। इन खिलाड़ियों की तैयारी के लिए थाईलैंड के स्पीड कोच और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के साथ दो सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं की चुनौतियों और जरूरतों को समझने का अवसर मिला। जोगा एक साधारण आदिवासी परिवार से आते हैं। ऐसे में उनकी यह उपलब्धि सिर्फ एक रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। यह दिखाती है कि सही अवसर, खेल सुविधाओं तक पहुँच और लगातार मिलने वाले सहयोग से किस तरह प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचने का मौका मिल सकता है। इस अनुभव ने दोनों खिलाड़ियों के सपनों को भी एक नई दिशा दी है। कभी दूर का सपना लगने वाले लॉस एंजिलिस 2028 ओलंपिक खेल अब उनके लिए एक वास्तविक लक्ष्य बन चुके हैं। ऐसे सफर में सिर्फ कोचिंग ही काफी नहीं होती, बल्कि एक ऐसे पूरे सिस्टम की जरूरत होती है, जो खिलाड़ी के विकास से जुड़ी हर जरूरत को समझे और उसका ध्यान रखे। टाटा स्टील के खेल कार्यक्रमों में खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता बढ़ाने, स्पोर्ट्स साइंस, पोषण, फिजियोथेरेपी, चोट से उबरने और मानसिक रूप से मजबूत बनने पर भी ध्यान दिया जाता है। बायोमैकेनिकल एनालिसिस, वीडियो के जरिए खिलाड़ियों के प्रदर्शन का आकलन और लगातार मॉनिटरिंग से कोच हर खिलाड़ी की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और उसी के अनुसार ट्रेनिंग में बदलाव करते हैं। जमशेदपुर में तीरंदाजी के लिए विशेष सुविधाएँ, क्योंझर में विकसित हो रहा केंद्र और जमशेदपुर व भुवनेश्वर में स्पोर्ट क्लाइंबिंग के लिए विशेष सुविधाएँ खिलाड़ियों को आगे बढ़ने और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए जरूरी आधार उपलब्ध कराती हैं। लेकिन यह पहल सिर्फ खिलाड़ियों की व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। एशियन किड्स और एशियन यूथ क्लाइंबिंग चैंपियनशिप जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को जमशेदपुर में आयोजित करने से युवा खिलाड़ियों को अपने ही शहर में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल और प्रतिस्पर्धा को करीब से समझने और उसका अनुभव लेने का अवसर मिलता है। क्योंकि भारतीय खेलों का भविष्य सिर्फ कुछ चैंपियनों के दम पर नहीं बनेगा। इसे आकार देंगे वे हजारों युवा, जिन्हें खेलों में हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा, वे संस्थान जो उनकी प्रतिभा को निखारेंगे और वह माहौल, जो उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करेगा। पहली बार निशाना लगाने वाली किसी तीरंदाज से लेकर ओलंपिक का सपना देखने वाले किसी पर्वतारोही तक, हर सफर की शुरुआत कहीं न कहीं से होती है। जरूरत इस बात की है कि उन्हें आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए सही माहौल और अवसर मिलें। हम सिर्फ चैंपियन नहीं गढ़ते, बल्कि ऐसी संस्कृति, आत्मविश्वास और संभावनाओं को भी बढ़ावा देते हैं, जो भारत के खेलों के भविष्य को और उज्ज्वल बनाती हैं। हम चैंपियन गढ़ते हैं, भविष्य संवारते हैं।





