सत्ता के संरक्षण में ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों के बल पर सरकारी नौकरियों की बोली लगाई गई। लेकिन सत्ता पक्ष के लोग ऐसे खामोश बैठे हैं, मानो कुछ हुआ ही ना हो।
इस सरकार में सीआईडी का इतिहास देखें, तो पता चलेगा कि किसी भी मामले में उनकी एंट्री सिर्फ छोटी मछलियों को फंसाने एवं बड़े लोगों को बचाने के उद्देश्य से होती है। शराब घोटाला से लेकर ऐसे तमाम मामले इसी ओर इशारा करते हैं।
इसी सीआईडी ने JSSC CGL मामले में कैसे लीपा-पोती किया, यह सर्व विदित है। क्या CID या सरकार यह बताएगी कि जब उस परीक्षा का सेकेंड टॉपर ही आज आपका आरोपी है, और उसके परिवार के कई सदस्यों को सरकारी नौकरी मिली है, तो वह परीक्षा निष्पक्ष कैसे थी? छात्रों के लगातार विरोध के बाद उस मामले को दबाने, तथा सवाल उठा रहे निर्दोष छात्रों/ शिक्षकों/ व्हिसल ब्लोअर को फर्जी मामलों में फंसाने वाले कौन लोग थे?
जब सत्ता के शीर्ष से जुड़े लोगों के रिश्तेदार ही जेपीएससी के इंटरव्यू पैनल में बैठ कर युवाओं के भविष्य के साथ छल कर रहे हों, तब इस सरकार से निष्पक्षता अथवा पारदर्शिता की उम्मीद कैसे रखें?
जब जेपीएससी के चेयरमैन भ्रष्ट्राचार में लिप्त पाए गए तथा कई कर्मचारी गिरफ्त में हैं, तो फिर राज्य सरकार की एजेंसी इसकी निष्पक्ष जाँच कर ही नहीं सकती। वैसे भी उत्पाद सिपाही की दौड़ में करीब डेढ़ दर्जन अभ्यर्थियों की मौत (संस्थागत हत्या) पर खामोश रहने वालों से न्याय की उम्मीद रखना बेवकूफी है।
युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को सरकारी संरक्षण नहीं, कठोर दंड मिलना चाहिए। हाई कोर्ट को इस मामले का संज्ञान लेकर पिछले कुछ वर्षों में JSSC और JPSC द्वारा की गई हर एक नियुक्ति प्रक्रिया की सीबीआई जाँच का आदेश देना चाहिए।





