25 साल बाद भी पानी को तरस रहा सारुदा गांव, बूंद-बूंद पानी के लिए जूझ रहे आदिवासी
डुमरिया (पूर्वी सिंहभूम): झारखंड राज्य गठन के 25 वर्ष बीत जाने के बावजूद पोटका विधानसभा क्षेत्र के डुमरिया प्रखंड अंतर्गत केंदुआ पंचायत का सारुदा गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। गांव के आदिवासी परिवार हर वर्ष गर्मी के मौसम में भीषण पेयजल संकट का सामना करने को मजबूर हैं। स्थिति ऐसी है कि ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर नदी और झरनों से पानी ढोकर लाना पड़ता है।
ग्रामीणों के अनुसार गर्मी बढ़ते ही गांव के अधिकांश कुएं और जलमीनार सूख जाते हैं। गांव में मौजूद एकमात्र जलमीनार भी पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं करा पाती और उसका पानी पीने योग्य नहीं माना जाता। ऐसे में ग्रामीण वर्षों पुराने कुएं के सहारे अपनी जरूरतें पूरी करते हैं, लेकिन गर्मी के चरम पर पहुंचते-पहुंचते वह भी सूख जाता है।
स्थानीय ग्रामीण राजू मुर्मू ने बताया कि गांव में पेयजल की समस्या वर्षों से बनी हुई है। उन्होंने कहा कि एक जलमीनार पूरे गांव की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती। जब कुएं और जलमीनार सूख जाते हैं, तब ग्रामीणों के पास नदी और झरनों का सहारा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। कई बार लोगों को झरने का पानी छानकर पीना पड़ता है ताकि किसी तरह जीवनयापन किया जा सके।
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव में पहुंचकर विकास और मूलभूत सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही उनकी समस्याओं की सुध लेने कोई नहीं आता। लगातार उपेक्षा के कारण ग्रामीणों में सरकार और जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सारुदा गांव के लोगों ने झारखंड सरकार से गांव में कम से कम दो नए जलमीनारों का निर्माण कराने की मांग की है, ताकि पेयजल संकट से स्थायी राहत मिल सके। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।
पेयजल संकट से जूझ रहे सारुदा गांव के आदिवासियों की यह कहानी विकास के उन दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने की बात कही जाती है। आज भी गांव के लोग बुनियादी जरूरत पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और समाधान की आस लगाए बैठे हैं।





