भोगनाडीह में आदिवासी अस्मिता पर प्रशासनिक दमन, लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन
– चम्पाई सोरेन
आज से 170 वर्ष पूर्व वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा वीरांगना फूलो-झानो ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हूल विद्रोह का बिगुल फूंका था। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि आज़ाद भारत में उनकी वीर भूमि भोगनाडीह एक बार फिर दमन और प्रशासनिक तानाशाही का शिकार बनेगी।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की आज़ादी के बाद भी, वीर सिदो-कान्हू के वंशजों और संथाल समाज को अपने ही पूर्वजों की स्मृति में शांतिपूर्ण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासन से भीख मांगनी पड़ रही है।
हूल दिवस 2025 : लोकतंत्र पर हमला
जून 2025 में वीर सिदो-कान्हू के वंशज श्री मंडल मुर्मू द्वारा संचालित संस्था “वीर सिदो-कान्हू हूल फाउंडेशन” ने हूल दिवस पर कार्यक्रम की अनुमति मांगी। एक महीने तक आवेदन लटकाने के बाद प्रशासन ने यह कहकर अनुमति रद्द कर दी कि पास में एक सरकारी कार्यक्रम है, जबकि उसी स्थान के आसपास पूर्व में भाजपा और झामुमो के कार्यक्रम बिना किसी रोक-टोक के होते रहे हैं।
पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले इस गांव की ग्रामसभा ने कार्यक्रम को मंजूरी दी थी, इसके बावजूद आधी रात को पुलिस ने शहीद परिवार द्वारा बनाए जा रहे पंडाल को तोड़ दिया। यह सीधे-सीधे संविधान और आदिवासी स्वशासन पर हमला है।
हूल दिवस के दिन, जब परंपरा अनुसार वंशज मांझीथान/जाहेरस्थान से लौटने वाले थे, प्रशासन ने उनकी अनुपस्थिति में वीर सिदो-कान्हू पार्क का ताला तोड़ दिया। सवाल पूछने पर ग्रामीणों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और बाद में फर्जी मुकदमे दर्ज कर लोगों को जेल भेज दिया गया।
संथाल परगना स्थापना दिवस : प्रशासन की साज़िश
हर वर्ष 22 दिसंबर को भोगनाडीह में संथाल परगना स्थापना दिवस शांतिपूर्ण ढंग से मनाया जाता रहा है। खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और युवाओं को प्रोत्साहन इस आयोजन का उद्देश्य रहा है।
पिछले वर्षों में प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी।
लेकिन इस वर्ष जैसे ही मुझे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया, प्रशासन हरकत में आ गया।
दो हफ्ते तक अनुमति जानबूझकर लटकाई गई
दर्जनों मजिस्ट्रेट तैनात किए गए
30 वॉलंटियरों की सूची आधार कार्ड सहित थाने में जमा करने की शर्त
फुटबॉल मैच के लिए मैदान में मजिस्ट्रेट
आयोजकों पर ट्रैफिक, नशा मुक्ति, जुआ-सट्टा रोकने की जिम्मेदारी
यह सब दर्शाता है कि कार्यक्रम को विफल करने के लिए एक सुनियोजित ट्रैप बिछाया गया है, ताकि किसी भी बहाने से दमनात्मक कार्रवाई की जा सके।
सवाल सीधे हैं
क्या आदिवासी कार्यक्रमों के लिए अलग कानून है?
क्या फुटबॉल खेल में मजिस्ट्रेट तैनात करना सामान्य प्रक्रिया है?
क्या प्रशासन का काम अब आयोजकों पर थोप दिया गया है?
क्या साहिबगंज जिला मेरे कार्यक्रमों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है?
मैं झारखंड के अन्य जिलों और राज्य के बाहर भी सामाजिक कार्यक्रमों में जाता हूँ—गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़, देवघर, चाईबासा, लोहरदगा—कहीं कोई समस्या नहीं होती।
तो फिर केवल साहिबगंज में ही दिक्कत क्यों?
अघोषित प्रतिबंध या राजनीतिक द्वेष?
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि चम्पाई सोरेन के साहिबगंज जिले में कार्यक्रम करने पर अघोषित रोक है।
यदि ऐसा है तो सरकार को साहस दिखाकर इसकी आधिकारिक घोषणा करनी चाहिए, ताकि देश की जनता सच्चाई जान सके।
सोमवार को होने वाले कार्यक्रम की अनुमति शनिवार शाम तक लटकाई गई, ताकि आयोजक हाई कोर्ट न जा सकें। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि प्रशासनिक षड्यंत्र है।
चेतावनी
नगड़ी आंदोलन के समय भी सरकार ने ताकत दिखाई थी—हाउस अरेस्ट, छह लेयर सिक्योरिटी—लेकिन जनता की जीत हुई।
अगर सरकार आज भी वही भाषा समझती है, तो बता दे—हम भी वही रास्ता अपनाएंगे।
30 जून, हूल दिवस के अवसर पर झारखंड, बंगाल, बिहार और ओडिशा से लाखों आदिवासी रथ के साथ भोगनाडीह पहुंचेंगे।
यह लोकतांत्रिक अधिकार है, कोई अपराध नहीं।
अगर सरकार में दम है, तो रोक कर दिखाए।
देखते हैं, जेलों में कितने लाख लोगों के लिए जगह है।






